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10 Mahavidya Ke Naam
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जानें दस महाविद्या के नाम और कैसे हुई उनकी उत्पत्ति

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” आदि शक्ति माँ पार्वती के ही दस स्वरूप हैं। दस महाविद्या का तात्पर्य है महान विद्या वाली देवी। महाविद्या की पूजा नहीं बल्कि साधना की जाती है। ज्यादातर तांत्रिक साधकों द्वारा इन स्वरूप की साधना की जाती है। जिनसे प्रसन्न होकर माता कामना दायक फल प्रदान करती है। खासकर गुप्त नवरात्र के दिनों में माता की विशेष आराधना की जाती है।

एक साधारण व्यक्ति भी अपनी अटूट साधना द्वारा इन दस महाविद्याओं को प्रसन्न कर फल प्राप्त कर सकता है। दस महाविद्या (dasha mahavidya) की साधना के विषय में जानने से पहले यह जान लेते है कि इन दस महाविद्याओं (das mahavidya) की उत्पत्ति किस प्रकार हुई है?

Table of Contents

कैसे हुई दस महाविद्यायों (Das Mahavidya) की उत्पत्ति:

एक बार राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने यज्ञ में समस्त देवी देवताओं को निमंत्रण दिया। परन्तु माता सती और शिव जी को नहीं बुलाया। राजा दक्ष शिव जी को पसंद नहीं करते थे। सती को जब यज्ञ के विषय में ज्ञात हुआ तो उन्होंने शिव जी से यज्ञ में जाने का आग्रह किया। महादेव जी ने उनकी बात नहीं सुनी तो सती माता को क्रोध आ गया और उन्होंने भयानक रूप धारण कर लिया जिसे देखकर शिव जी डर गए और इधर उधर भागने लगे।

माता ने जब यह देख तो शिव जी जिस दिशा में जा रहे थे। वहां वह जाने लगी, इस तरह उनके शरीर से विग्रह प्रकट होकर शिव जी को रोकने लगे। शिव जी के दस दिशाओं में जाने से दस दिशाओं में माता के दस विग्रह रूप प्रकट हुए जो की,”दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” के नाम से जाने जाने लगी। इसके बाद शिव जी ने माता सती को यज्ञ में जाने की आज्ञा दे दी। परन्तु वहां पर माता सती का अपने पिता के साथ विवाद हो गया और माता ने उसी यज्ञ कुंड में अपनी आहुति दे दी।

दस महाविद्या के नाम (10 Mahavidya Ke Naam)

दस महाविधाओं (10 mahavidya names) के नाम निम्न है। आइए जानें इन दस महाविद्याओं के बारे में विस्तार से।

1) महाविद्या काली (Kali)

10 Mahavidya Ke Naam - Kali

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में प्रथम स्वरूप माँ काली का है। माँ काली का नाम लेते है हमारे समक्ष उनका अद्भुत और भयंकर रूप दिखाई देने लगता है। माता काली राक्षसों का संहार वाली है। माँ सती के शरीर से माँ काली प्रथम महाविद्या के रूप में प्रकट हुयी थी। यह बहुत ही विशिष्ट और प्रभावशाली माँ है। इनका स्वभाव भगवान शंकर की ही भांति है। यह पल में प्रसन्न होती है और पल में रौद्र रूप धारण कर लेती है।

कैसा है महाविद्या काली का स्वरूप:

दश महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में माँ काली के स्वरूप का वर्णन किया जाए तो माँ काली के शरीर का रंग काला है। उनके केश खुले हुए है। भगवान शंकर की भांति उनके तीन नेत्र है। माता अपने चारों भुजाओं में से एक में राक्षस का सिर, खड़ग, वर मुद्रा और अभय मुद्रा को धारण किये हुए है। माँ का मुख क्रोधित है, जो की फ़ुफ़कार भरते हुए दिखाई देता है। जीभ बाहर की तरह राक्षसों के रक्त से भरी हुई है।

क्या है महाविद्या काली की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य:

शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे भयानक राक्षसों ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आतंक मचा रखा था। रक्तबीज को वरदान था कि जहाँ भी उसके शरीर का रक्त गिरेगा वहां से एक और रक्तबीज राक्षस उत्पन्न हो जायेगा। जिस कारण उसका संहार करना मुश्किल था। संहार करने के लिए महाविद्या काली की उत्पत्ति हुयी। माँ ने अपने भयंकर स्वरूप में रक्तबीज का वध किया और उसके शरीर से निकले रक्त को पी गयी ताकि वह धरती पर न गिरने पाए । इस तरह रक्तबीज जैसे रक्षा का विनाश हुआ।

महाविद्या काली की साधना के लाभ:

  • “दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में महाविद्या काली को परिवर्तन की देवी के रूप में भी जाना जाता है। इसलिए इनकी साधना से आप स्वयं में परिवर्तन ला सकते है।
  • यह निर्भयता प्रदान करने वाली है। यह दुष्टों का संहार करने वाली है।
  • साधकों की साधना से प्रसन्न होकर माँ उनकी कामना पूर्ण करती है। इसलिए ज्यादातर साधक माँ काली के भक्त होते है और उनकी साधना में लीन रहते है।

 

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2) महाविद्या तारा (Tara)

10 Mahavidya Ke Naam - Tara

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में देवी तारा दूसरी महाविद्या है। माता सती के शरीर से देवी तारा का जन्म हुआ था। इसलिए यह माता काली के समान मानी जाती है। महर्षि वशिष्ठ ने देवी तारा की सबसे पहले आराधना की थी। देवी तारा शत्रुओं का नाश करती है और मोक्ष प्रदान करती है। देवी तारा के तीन रूप है एक- तारा, दूसरा एकजटा और तीसरा नील सरस्वती।

कैसा है महाविद्या तारा का स्वरूप:

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में माँ तारा का शरीर नील वर्ण का है जिस कारण उन्हें नील सरस्वती भी कहा जाता है। माँ काली की भांति माँ तारा के गले में भी मुंड माला धारण रहती है। माँ तारा के केश खुले हुए रहते है। माँ के एक हाँथ में तलवार, दूसरे में खड्ग, तीसरे हाँथ में कैंची और चौथे हाँथ में कमल का फूल रहता है।

क्या है महाविद्या तारा की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य:

समुद्र मंथन के समय जब एक एक करके समुद्र से चीजे बाहर निकली, तो पहले बहुत अधिक मात्रा में विष निकला। इस विष के प्रभाव से सृष्टि को बचाने हेतु भगवान शंकर ने विष का पान किया था। परन्तु विष इतना विषैला था कि वह मूर्छित होने लगे। तभी माँ दुर्गा ने माँ तारा का रूप धारण किया और भगवान शंकर को स्तनपान कराया। शंकर जी पर विष का प्रभाव कम होने लगा। इसके बाद से तारा देवी माता के रूप में जानी जाने लगी।

महाविद्या तारा की साधना के लाभ:

  • मोक्ष प्राप्ति के लिए माता तारा की साधना की जाती है।
  • माँ आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाती है।
  • नौकरी और उन्नति के लिए भी माँ तारा की आराधना की जाती है।

 

3) महाविद्या छिन्नमस्ता (Chhinnamasta)

10 Mahavidya Ke Naam - Chhinnamasta

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में तीसरी महाविद्या है माँ छिन्नमस्ता। छिन्नमस्ता माता को छिन्नमस्तिका और प्रचण्ड चण्डिका के नाम से भी जाना जाता है। छिन्नमस्ता माता को समस्त चिंताओं का हरण करने वाली माँ के रूप में जाना जाता है।

कैसा है महाविद्या छिन्नमस्ता का स्वरूप:

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में छिन्नमस्ता माता के स्वरूप की बात करें तो वह अपने एक हाँथ में अपना कटा हुआ सिर धारण किये हुए है । वहीँ उनके दूसरे हाँथ में खडक है। शंकर जी के समान इनके भी तीन नेत्र है और वह गले में मुंड माला धारण किये हुए है।

क्या है महाविद्या छिन्नमस्ता की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य:

छिन्नमस्ता की उत्पति के विषय में यह किदवंती है कि एक बार माता पार्वती अपनी दो सखियों के साथ नदी तट पर स्नान करने गयी। कुछ समय बीतने के बाद उनकी सहचरियों को तीव्र गति से भूख लगने लगी और वह दोनों माँ पार्वती से शीध्र ही भोजन की व्यवस्था करने को कहने लगी। उन्हें इस तरह भूख से व्याकुल देखकर माँ पार्वती ने तुरंत ही अपना सिर धड़ से अलग कर लिया। जिसके पश्चात् उनका सर उनके एक हाँथ में आ गया और रक्त की तीन धाराएं बहने लगी जिसमे दो धाराएं उनकी सखियों के मुँह में और एक धारा स्वयं माता के मुँह में जाने लगी। इस तरह माँ छिन्नमस्ता माता का जन्म हुआ।

महाविद्या छिन्नमस्ता की साधना के लाभ:

  • माता की उपासना से साधक को सरस्वती की सिद्धि प्राप्त होती है।
  • माता चिंताओं का हरण करने वाली है। उपासक को बुद्धि ज्ञान प्राप्त होता है।

 

4) महाविद्या त्रिपुर सुंदरी (Shodashi)

10 Mahavidya Ke Naam - Shodashi

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में चौथी महाविद्या त्रिपुर सुंदरी है। माता षोडश कलाएं से पूर्ण है इसलिए इन्हें षोडशी के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त माँ को राज राजेश्वरी और ललिता भी कहा जाता है। यह लाल वस्त्र पहनकर कमल पर विराजमान रहती है।

कैसा है महाविद्या त्रिपुर सुंदरी का स्वरूप:

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में त्रिपुर सुंदरी माता सबसे सुन्दर माता है। यह कमल पर विराजमान रहती है और लाल रंग के वस्त्र धारण करती है। उनका रंग सुनहरा है। उनके केश खुले हुए है। शिव जी के समान उनके तीन नेत्र है। उनकी चार भुजाओं में धनुष, बाण, डोरा यानि की पाश और अंकुश रहता है।

क्या है महाविद्या त्रिपुर सुंदरी की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य:

माता सती के वियोग में शंकर जी हर समय ध्यान मग्न रहने लगे। उन्होंने सम्पूर्ण कर्म का परित्याग भी कर दिया था। वहीं तारकासुर ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर वरदान लिया की उसकी मृत्यु भगवान शंकर के पुत्र द्वारा हो। वरदान मिलने से तारकासुर ने तीनों लोक में आतंक मचा रखा था। देवताओं ने शिव जी को ध्यान से बाहर लाने के लिए कामदेव और देवी रति को भेजा।

जहाँ कामदेव ने कुसुम सर नामक बाण से शिव जी पर प्रहार किया, जिसके कारण शिव जी की तीसरी आंख खुल गयी और उन्होंने क्रोध में कामदेव को भस्म कर दिया। रति के विलाप के कारण भगवान शिव ने कामदेव को द्वापर युग में कृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया और वहां से अंतर्ध्यान हो गए। कामदेव की भस्म हुई राख से शंकर जी के एक गण ने एक मूर्ति निर्मित की जिससे एक पुरुष उत्पन्न हुआ।

इस पुरुष ने शिव की आराधना की और भांड नाम प्राप्त किया। शिव जी के क्रोध से उत्पन्न होने के कारण उसकी प्रवति तमोगुण वाली थी। जिस कारण वह तीनो लोक पर आतंक करने लगा। फिर देवराज इंद्र ने नारदमुनि के परामर्श से माता की अपने रक्त और मांस द्वारा आराधना की। माता ने त्रिपुर सुंदरी का रूप धारण किया और भण्डासुर जैसे अधर्मी का विनाश कर लोगों की रक्षा की।

महाविद्या त्रिपुर सुंदरी की साधना के लाभ:

  • गृहस्थ जीवन में सुख की प्राप्ति के लिए माँ की आराधना की जाती है।
  • संतान प्राप्ति हेतु भी साधना की जा सकती है।
  • जिन्हें विवाह में बाधा आ रही है वह भी माता की आराधना कर उन्हें प्रसन्न कर सकते है।

 

5) महाविद्या भुवनेश्वरी (Bhuvaneshvari)

10 Mahavidya Ke Naam - Bhuvaneshvari

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में पाँचवीं महाविद्या भुवनेश्वरी माता को माना जाता है। पुत्र प्राप्ति के लिए इनकी उपासना करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

कैसा है महाविद्या भुवनेश्वरी का स्वरूप:

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में माता भुवनेश्वरी सिहासन पर विराजमान रहती है। उनका वर्ण सुनहरा है। सिर पर चन्द्रमा और केश खुले हुए है। वह लाल और पीले रंग के वस्त्रों से सुसज्जित रहती है। उनके तीन नेत्र है साथ ही चार हांथो में से दो हाँथ वरदान मुद्रा में है और उन्होंने दो हांथो में अंकुश और पाश लिया हुआ है।

क्या है महाविद्या भुवनेश्वरी की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य:

बताया जाता है कि जब मधु-कैटभ नामक राक्षसो ने धरती पर आतंक मचाया था। तब सभी देवता भगवान विष्णु से मदद मांगने पहुंचे। भगवान विष्णु ने मधु-कैटभ से पांच हजार वर्षों तक युद्ध किया। अधिक समय हो जाने के कारण विष्णु जी ने योगमाया आद्या शक्ति से मदद मांगी। तब माता ने राक्षसो को मोहित कर दिया । दैत्यों ने विष्णु जी से कहा कि उन्हें ऐसे स्थान पर मारे जहाँ न ही थल हो और न ही जल।

तब विष्णु जी ने अपनी जांघों पर रख कर उनका वध किया। इसके बाद ब्रम्हा, विष्णु और महेश ने आदि शक्ति महामाया की आराधना की। योगमाया ने ब्रम्हा जी को सृजन के लिए, विष्णु जी को पालन के लिए और शंकर जी को संहार के लिए चुना। इसके बाद तीनों देवों ने जब एक स्थान पर सिंहासन पर सुसज्जित देवी को देखा। जो अलौकिक शोभा से प्रकाशित थी। यह माता भुवनेश्वरी थी।

महाविद्या भुवनेश्वरी की साधना के लाभ:

  • माता की उपासना से सम्मोहन शक्ति प्राप्त होती है।
  • माता सुख और वैभव प्रदान करने वाली है।

 

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6) महाविद्या भैरवी (Bhairavi)

10 Mahavidya Ke Naam - Bhairavi

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में छठी महाविद्या भैरवी को माना जाता है। इन्हें त्रिपुर भैरवी के नाम से भी जाना जाता है। यह एक काल रात्रि विद्या होती है।

कैसा है महाविद्या भैरवी का स्वरूप:

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में त्रिपुर भैरवी माता के तीन नेत्र है। वह अपने चारो हांथो में पुस्तक, जपमाला, वर व एक में अभय मुद्रा को धारण करती है। वह लाल रंग के वस्त्र पहनती है और उनके गले में मुंडमाला रहती है।

क्या है महाविद्या भैरवी की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य:

कथा के अनुसार एक बार आदि शक्ति माता काली को लगता है कि उन्हें फिर अपने गौर वर्ण में आना चाहिए। यह विचारकर वह अंतर्ध्यान हो जाती है। जब भोले नाथ देवी पार्वती को समक्ष नहीं देखते तो वह व्याकुल होकर उन्हें खोजने लगते है। वह नारद जी से भी इस विषय में पूछते है।

तो नारद जी भोले नाथ को सुमेरु के उत्तर दिशा में खोजने का परामर्श करते है। तब भोलेनाथ उस स्थान पर पहुंचते है। साथ ही नारद जी भी वह पहुंच जाते है और वह माता से शंकर जी के विवाह का प्रस्ताव रख देते है। यह सुनते ही माता क्रोधित हो जाती है और उनके शरीर से एक विग्रह उत्पन्न हो जाता है। यह विग्रह माता भैरवी का होता है।

महाविद्या भैरवी की साधना के लाभ:

  • माता भक्तों को अभय प्रदान करती है।
  • जिन लोगों को शारीरिक कष्ट हो उन्हें माता के इस रूप की उपासना करनी चाहिए।

 

7) महाविद्या धूमावती (Dhumavati)

10 Mahavidya Ke Naam - Dhumavati

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में सातवीं महाविद्या धूमावती को माना गया है। जो व्यक्ति इनकी आराधना करता है उसे अपने शत्रुओं से कभी पराजय नहीं मिलती। अन्य माताओं से इनका रूप कुछ विपरीत है। यह दरिद्र की देवी है। साथ ही कलह के लिए भी जानी जाती है।

कैसा है महाविद्या धूमावती का स्वरूप:

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में माँ का यह स्वरूप दरिद्र की तरह है। उन्हें एक विधवा के रूप में दिखाया गया है। माँ का यह रूप भूख से व्याकुल एक बूढ़ी स्त्री की भांति है।

क्या है महाविद्या धूमावती की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य:

कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती शिव जी के साथ कैलाश पर्वत पर विराजमान थी। तभी उन्हें भूख का अनुभव हुआ तो उन्होंने शंकर जी से निवेदन किया। परन्तु भोलेनाथ ने माता पर ध्यान नहीं दिया। तब माता ने क्रोध में शंकर जी को ही निगल लिया। शिव जी धुएँ के रूप में बाहर प्रकट हुए और पार्वती जी को धुएं ने घेर लिया। तभी से वह माँ धूमावती के नाम से जानी जाने लगी।

महाविद्या भैरवी की साधना के लाभ:

  • इनकी आराधना से मनुष्य को संकटो से मुक्ति मिलती है।
  • यह भक्तो की भूख को शांत करती है।

 

8) महाविद्या बगलामुखी (Bagalamukhi)

10 Mahavidya Ke Naam - Bagalamukhi

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में आठवीं महाविद्या बगलामुखी माता को माना गया है। माता को पीतांबरा देवी के नाम से भी पूजा जाता है। बगलामुखी माता के कारण ही सृष्टि में तरंगे है। माता शत्रुओं का विनाश करने वाली है।

कैसा है महाविद्या बगलामुखी का स्वरूप:

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में माता बगलामुखी सिहासन पर विराजमान है। सिर पर वह मुकुट धारण किये हुए है और उनके केश खुले हुए है। माता पीले रंग के वस्त्र पहने हुए रहती है। वह एक हाँथ में शत्रुओं के नाश के लिए अस्त्र और एक हाँथ में राक्षस की जिव्हा पकडे हुए है।

क्या है महाविद्या बगलामुखी की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य:

कथा के अनुसार एक बार धरती पर बिनाशकारी तूफ़ान आया। चारों तरफ हाहाकार मच गया। विष्णु जी इसे देखकर चिंतित हुए और शिव जी से इस समस्या का हल पूछा। तो शिव जी ने शक्ति की उपासना करने को कहा। तब विष्णु जी सौराष्ट्र के हरिद्रा सरोवर के समीप उपासना करने लगे। उनकी उपासना से प्रसन्न होकर देवी बगलामुखी प्रकट हुई और उन्होंने बिनाशकारी तूफ़ान का अंत किया।

महाविद्या बगलामुखी की साधना के लाभ:

  • माता की आराधना करने से विपत्ति का नाश होता है।
  • माता दुष्टों का संहार करती है।

 

9) महाविद्या मातंगी (Matangi)

10 Mahavidya Ke Naam - Matangi

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में नौवीं महाविद्या मातंगी को माना गया है। माँ मातंगी को जूठन का भोग लगाया जाता है।

कैसा है महाविद्या मातंगी का स्वरूप:

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में माता के सिर पर अर्ध चंद्र है। माता के चारों हांथो में से वीणा, गूंजा के बीजो की माला, कपाल और खड़ग है। हाँथ में वीणा होने के कारण उन्हें संगीत की देवी भी कहा जाता है। उनका वर्ण श्याम है।

क्या है महाविद्या मातंगी की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य:

मातंगी माँ के विषय में कथा कुछ इस प्रकार प्रचलित है जिसमे एक बार भगवान् विष्णु और माँ लक्ष्मी कैलाश पर्वत पर शिव जी और माता पार्वती से मिलने गए। अपने साथ वह कुछ खाद्य सामग्री भी ले गए। माता पार्वती ने जब खाद्य सामग्री को ग्रहण किया तो उसका कुछ अंश पृथ्वी पर गिर गया। जिससे एक श्याम वर्ण की दासी का जन्म हुआ। यह माँ मातंगी के नाम से प्रसिद्ध हुयी।

महाविद्या मातंगी की साधना के लाभ:

  • माता की आराधना से बुद्धि और विद्या का विकास होता है।
  • यह संगीत की देवी है इसलिए इनकी उपासना से संगीत की प्राप्ति होती है।

 

10) महाविद्या कमला (Kamala)

10 Mahavidya Ke Naam - Kamala

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में दसवीं महाविद्या कमला माता को माना गया है। यह माता समृद्धि प्रदान करती है। माँ को माता लक्ष्मी का रूप माना जाता है।

कैसा है महाविद्या मातंगी का स्वरूप:

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” में माता का वर्ण सुनहरे रंग का है और लाल रंग के वस्त्र पहने हुए है। माँ कमल पर विराजमान रहती है। माँ के दो हांथो में कमल के पुष्प है और अन्य दो हाँथ अभय और वर मुद्रा में है।

क्या है महाविद्या मातंगी की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य:

कथा के अनुसार एक बार ऋषि दुर्वाषा के श्राप के कारण सभी देवता शक्ति विहीन हो गए। विष्णु जी के पास से लक्ष्मी जी भी चली गयी। सारा जगत कांतिहीन हो गया। तब लक्ष्मी जी को वापस लाने के लिए समुद्र मंथन किया गया। इस मंथन में से कमल के फूल पर विराजमान कलमा देवी का अवतरण हुआ।

महाविद्या मातंगी की साधना के लाभ:

  • कलमा माँ लक्ष्मी जी का रूप है इसलिए इनकी उपासना से धन धान्य की वृद्धि होती है।
  • सुख की प्राप्ति होती है।

 

नवरात्री के समय इन “दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” की विशेष उपासना करने से लाभ की प्राप्ति होती है। साधक गुप्त नवरात्री में घोर तपस्या कर दस महाविद्या को प्रसन्न कर इक्छित वर प्राप्त करते है।

Frequently Asked Questions

Question 1: महा विद्या कितने प्रकार की होती है ?

महाविद्या माँ पार्वती का रूप है जो क़ी 10 महाविद्या के नाम से जानी जाती है।

Question 2: दस महाविद्याएं (dasamahavidya names) कौन कौन सी है ?

“दस महाविद्या (10 Mahavidya Ke Naam)” के नाम है – काली, तारा, छिन्नमस्ता, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।

 

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