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Kabir Das Ke Dohe
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11 सर्व प्रसिद्ध कबीर दास के दोहे जो हर युग में प्रासंगिक है।

कबीर दास के दोहे (Kabir Das ke dohe) आपने भी कई लोगों से सुने होंगे, शायद आप कुछ दोहों को अपने जीवन में अपनाते भी होंगे और अपने आगे की पीढ़ी को भी उनसे प्रेरित करते होंगे। कबीर दास जी के दोहे (Kabir Das ke dohe) जीवन से बहुत नजदीक से जुड़े हैं, इसलिए वो पहले भी लोगों को प्रेरणा देते थे और आज भी देते हैं।

 

कबीर दास का जीवन परिचय – कौन थे कबीर दस?

कबीर दास एक प्रसिद्ध कवि, समाज सुधारक और संत थे। वह हिन्दू थे या मुसलमान इस पर आज भी कोई एकमत नहीं है क्योंकि वे कभी सूफियों जैसे कपड़े पहनते और कभी हिन्दुओं जैसे। वे जीवन भर अन्धविश्वास और पाखंड के विरुद्ध रहे और उसके खिलाफ कई काव्य भी लिखे। वह कहते थे “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम सबको सम्मति दे भगवान”। वे कहते थे ईश्वर और अल्लाह दोनों एक हैं, उनके इसी आन दोलन के कारण मुसलमान और हिन्दू दोनों धर्म के लोगों ने उन्हें परेशान किया। वे प्रताड़ित हुए लेकिन कभी भी हिन्दू और मुसलमानों को अपना दुश्मन नहीं माना, उनके लिए हर धर्म का व्यक्ति उनका भाई बंधू था।

कबीर दास जी ऐसे कवि थे जिन्होंने समाज में चल रहे आडम्बरों के खिलाफ खुलकर लिखा। उनका विरोध और लोक कल्याण के प्रति उनका प्रयास उनकी रचनाओं में भी दिखता है। कबीर दास के दोहे (kabir das ke dohe) लोगों को समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने और उससे लड़ने के लिए प्रेरित करते थे और वो अपने इस प्रयास में काफी हद तक सफल भी हुए। वो स्वयं सत्य, अहिंसा, सदाचार, प्रेम और लोगों की मदद करने में विश्वास करते थे। उनके द्वारा रचे दोहे आज स्कूल में बच्चों को पढ़ाये जाते हैं ताकि बचपन से ही वो कबीर दास जी के विचारों को अपना सकें और अच्छे इंसान बने।

आज हम आपको प्रेरित करने करने के लिए कबीर दास के दोहे (kabir das ke dohe) लेकर आए हैं। चलिए शुरू करते है कबीर दास जी के पहले दोहे से।

 

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कबीर दास के दोहे (Kabir Das Ke Dohe)

दोहा 1

kabir das ke dohe

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय ।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥

अर्थ- 

इस दोहे में कबीर दस एक सवाल पूछ रहे हैं कि अगर तुम्हारे सामने स्वयं ईश्वर और तुम्हारे गुरु खड़े हैं तो सबसे पहले किसके चरण स्पर्श करोगे। वो कहते है आपको गुरु के पैर पहले छूने चाहिए क्योंकि गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊंचा है, वो गुरु ही हैं जो अपने ज्ञान के द्वारा व्यक्ति को ईश्वर से मिला सकते हैं।

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दोहा 2

कबीर के दोहे

सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज ।

सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए ।

अर्थ- 

इस दोहे में कबीर गुरु की महानता के बारे में बता रहे है। वो कह रहे है कि गुरु में इतने गुण होते है कि अगर पूरी धरती को कागज़ बनाकर सभी वृक्षों से बनी कलम ले और समस्त समुद्रो के पानी जितनी स्याही भी इस्तेमाल कर ले तब भी उनके सभी गुणों के बारे में नही लिख जा सकता है।

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दोहा 3

Kabir Das ke dohe - कबीर के दोहे

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।

जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ।

अर्थ- 

इस दोहे में कबीर कह रहे हैं कि वो हमेशा से ही दूसरे लोगों की गलतियाँ, उनकी बुराइयाँ देखते रहते थे लेकिन जब उन्होंने अपने अन्दर झांककर देखा तो उन्हें पता चला कि उनके अन्दर सबसे ज्यादा बुराइयाँ हैं। इस दोहे का अर्थ है दुनिया का व्यक्ति सिर्फ दूसरो में बुराइयाँ ढूंढता है और गिनाता रहता है लेकिन जब वो स्वयं अपने अन्दर झांकेगा तो उसे पता चलेगा कि उससे ज्यादा बुरा इस दुनिया में कोई नहीं है।

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दोहा 4

Kabir Das ke dohe - कबीर के दोहे

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे ।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ।

अर्थ- 

इस दोहे में कबीर जी जीवन की सच्चाई से सबको सचेत करना चाहते हैं। वो कह रहे हैं जब बर्तन बनाने के लिए कुम्हार मिट्टी को रोंदता है तब मिट्टी उससे कहती है कि तुम मुझे क्या रौंदेगा जब तू मृत्यु को प्राप्त होगा तब मैं तुझे रौंदूंगी, अर्थात व्यक्ति को कभी भी किसी चीज का घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि वो एक न एक दिन मिट्टी में विलीन हो जाएगा।

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दोहा 5

Kabir Das ke dohe - कबीर के दोहे

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।

पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ।

अर्थ- 

इस दोहे में कबीर जी समझा रहे हैं कि व्यक्ति को आलस के चलते आज का काम कल पर नहीं डालना चाहिए। आज का काम आज और अभी करना चाहिए क्योंकि व्यक्ति के पास कितना समय बचा है ये कोई नहीं बता सकता है। प्रलय कब आ जाए कोई नहीं कह सकता और उस प्रलय में हमारा क्या होगा ये भी निश्चित नहीं है इसलिए आज का काम आज ही ख़त्म करने में समझदारी है।

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दोहा 6

Kabir Das ke dohe - कबीर के दोहे

तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय ।

सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए ।

अर्थ- 

इस दोहे में कबीर जी समझ रहे हैं कि व्यक्ति को सिर्फ अपने शरीर की ही नहीं बल्कि मन की भी सफाई करनी चाहिए अर्थात अगर मन साफ़ नहीं होगा तो व्यक्ति गलत काम करेगा और जीवन में दुःख भोगेगा और अगर मन साफ़ होगा तो वो किसी के साथ भी बुरा करने की नहीं सोचेगा और वो हमेशा जीवन में संतुष्ट और सुखी रहेगा।

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दोहा 7

Kabir Das ke dohe - कबीर के दोहे

प्रेम पियाला जो पिए, सिस दक्षिणा देय ।

लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ।

अर्थ- 

इस दोहे में कबीर दास जी कह रहे हैं कि यदि ईश्वर को और उनकी भक्ति और प्रेम को पाना है तो व्यक्ति को काम, क्रोध, लोभ, मोह, इच्छाएँ, डर सब छोड़ देना होगा क्योंकि जो व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह, इच्छाएँ, डर से बंधा रहता है वो कभी भी सच्ची श्रद्धा से ईश्वर की भक्ति नहीं कर सकता और न ही उन्हें पा सकता है।

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दोहा 8

Kabir Das ke dohe - कबीर के दोहे

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये ।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाए ।

अर्थ- 

इस प्रसिद्ध दोहे में कबीर जी ईश्वर से प्रार्थना कर रहे है कि हे ईश्वर! मैं सिर्फ इतना धन चाहता हूँ जिससे न मेरा परिवार भूखा रहे, मैं भी भूखा न रहूँ और न ही मेरे घर और मेरे द्वार आया कोई भी व्यक्ति मेरे घर से भूखा जाए। व्यक्ति को ईश्वर से उतना ही मांगना चाहिए जितने की उसे और उसके परिवार को आवश्यकता है, ज्यादा लालच नहीं करना चाहिए।

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दोहा 9

Kabir Das ke dohe - कबीर के दोहे

आये है तो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर ।

इक सिंहासन चढी चले, इक बंधे जंजीर ।

अर्थ- 

इस प्रसिद्ध दोहे में कबीर जी अटल सत्य मृत्यु के बारे में बता रहे हैं। वो कह रहे हैं कि इस धरती पर जिसने भी जन्म लिया है, चाहे वो व्यक्ति हो, जानवर हो या कोई वनस्पति हो सभी का अंत निश्चित है। राजा हो या फ़क़ीर जब मृत्यु होती है तो दोनों को ही सामान रूप से यमदूत जंजीरों में बांधकर यमलोक ले जाते है।

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दोहा 10

Kabir Das ke dohe - कबीर के दोहे

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय ।

मीठे वचन सुना के, जग अपना कर लेय ।

अर्थ- 

इस दोहे में कबीर जी बोली के फर्क को समझा रहे हैं। वो कहते है कि कौआ किसी का धन चोरी नहीं करता फिर भी लोग कौवे को पसंद नहीं करते जबकि कोयल से उन्हें कोई धन प्राप्त नहीं होता है, फिर भी वो कोयल को पसंद करते हैं। क्या वजह है कि कोयल को पसंद करते है, कौवे को नहीं।

अंतर सिर्फ बोली का है, कोयल की मीठी बोली सबका मन मोह लेती है और सब उसको पसंद करने लगते हैं और कौवे की बोली सुनकर सभी उसको भगा देते हैं। इसी प्रकार व्यक्ति जो सभी से मीठा बोलता है लोग उसी के साथ रहना और बात करना पसंद करते हैं और जो हमेशा चिल्लाता है, कटु वचन बोलता है, नकारात्मक बातें करता है, लोग उनके साथ अपना एक मिनट भी नहीं बिताना चाहते।

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दोहा 11

Kabir Das ke dohe - कबीर के दोहे

ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माँहि।

मूरख लोग न जानिए , बाहर ढूँढत जाहिं

अर्थ- 

इस दोहे में कबीर जी हमें ये समझा रहे हैं कि ईश्वर तो हमारे अन्दर है और हम मुर्ख लोग ईश्वर को इधर उधर तलाशते हैं। ईश्वर हमारे अन्दर ठीक वैसे ही है जैसे आँखों के अन्दर पुतली। व्यक्ति अगर ईश्वर को पाना चाहता है तो उसे वो अपने अन्दर ही मिलेगा, बस जरूरत है सच्चे प्रेम, सच्ची भक्ति और सच्ची श्रद्धा की।

 

हमने आज आपको कबीर दास के दोहे (Kabir Das ke dohe) और उसके अर्थ बताए। आप सभी दोहों में से किस दोहे से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं और किस दोहे को आप मिसाल के तौर पर इस्तेमाल करते है?

 

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