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प्राणायाम योग के आठ अंगों में से एक है – जानें प्राणायाम का अर्थ और 8 प्रकार

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आजकल की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में व्यक्ति को स्वयं पर ध्यान देने का समय नहीं है। साथ ही खानपान भी संतुलित नहीं रहता। जिस कारण आज हमारा शरीर कई बीमारियों से ग्रसित होने लगा है। मोटापा, डिप्रेशन, हाई ब्लडप्रेशर, मधुमेह, तनाव जैसे रोगों ने अनेक लोगों को अपनी चपेट में ले रखा है। लोगों ने इन बीमारियों से दूर रहने के लिए अपने स्वस्थ्य पर ध्यान देना आरंभ कर दिया है।

लोग इसके लिए योग, ध्यान, जिम आदि भी करने लगे है। आपको बता दे कि शरीर को स्वथ्य और ऊर्जावान रखने का एक और तरीका है, वह है प्राणायाम। कभी न कभी आपने इसका नाम तो सुना होगा। परन्तु क्या आप जानते है की आखिर प्राणायाम क्या होता है ? “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” कितने होते है? हम आपको इस लेख में प्राणायाम से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी देने वाले है। इसलिए इस लेख को आप पूरा पढ़िए।

प्राणायाम का क्या अर्थ है ? (Pranayam Ka Kya Arth Hai)

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” को जानने से पहले यह जानना ज़रुरी है कि प्राणायाम का अर्थ क्या होता है?
प्राणायाम दो शब्दों से निर्मित है प्राण और आयाम। प्राण यानी कि हमारे शरीर को जीवित रखने का माध्यम। इस प्राण के बिना शरीर नश्वर हो जाता है। आयाम यानी नियंत्रण रखना या फिर विस्तार करना। इस तरह प्राणायाम वह प्रक्रिया है जिसमे प्राणों को नियंत्रित करके उसका विस्तार किया जाता है। प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य शरीर और मन को जोड़ना है।

प्राणायाम से क्या होता है? (Benefits Of Pranayama Yoga)

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” को जानने से पूर्व यह भी जानकारी आवश्यक है कि जो प्राणायाम किया जाता है वह कितना उपयोगी है। तभी आप उसके सही महत्त्व को समझ सकते है। प्राणायाम करने से बहुत लाभ होते है। प्राणायाम के फायदे (Benefits of Pranayama Yoga) जो कुछ इस तरह है।

  • बढ़ती उम्र की गति को कम करने में सहायक – यदि प्राणायाम को नियमित रूप से किया जाता है तो यह स्किन पर काफी असरकारक होता है। यह प्राणायाम बढ़ती उम्र की गति की धीमा कर देता है। इससे स्किन पर निखार आने लगता है और आप जवाँ दिखने लगते है।
  • मोटापा को कम करने में मददगार – आजकल ज्यादातर लोग वजन बढ़ने की समस्या को लेकर चिंतित रहते है। प्राणायाम करने से वजन कम होता है। नियमित रूप से प्राणायाम को करने से यह शरीर से अतिरिक्त वसा को पिघला देता है। जिससे आपका वजन धीरे धीरे कम होने लगता है। साथ ही शरीर भी स्वस्थ्य रहता है।
  • मानसिक रूप से बनाये सशक्त – ऐसा माना जाता है कि जब आप मानसिक रूप से मजबूत होते है तो आप सभी कार्यों को सही से और सफलता पूर्वक कर पाते है। मानसिक रूप से स्ट्रांग होने पर आपका मन शांत रहता है। आप तनाव, डिप्रेशन जैसी समस्याओं से दूर रहते है। प्राणायाम करने से आप मानसिक रूप से सशक्त बनते है। यह आपको एकाग्रता प्रदान करता है।
  • पाचन तंत्र के कार्य में सुधार करने में सहायक – यदि आपका पाचन तंत्र अच्छा रहेगा तो आपका शरीर कई बीमारियों से बचा रहेगा। पाचन तंत्र को सुचारु रूप से कार्य करने में प्राणायाम का विशेष योगदान रहता है। प्राणायाम में साँस को नियंत्रित करने की क्रिया होती है जिससे पेट के अंगो की मालिश होती है और वह सक्रीय हो जाते है।
  • सिगरेट की तलब को कम करने में सहायक –जिस भी व्यक्ति को सिगरेट पीने की लत हो जाती है। वह आसानी से सिगरेट को छोड़ नहीं पाता है। इस आदत को दूर करने के लिए प्राणायाम बहुत मददगार होता है। प्राणायाम उन लोगों में सिगरेट की लालसा को कम कर सकता है जो धूम्रपान छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। एक अध्ययन के द्वारा यह ज्ञात हुआ है कि यदि 10 मिनट का भी प्राणायाम किया जाए तो सिगरेट पीने की इच्छा में अल्पकालिक कमी आ सकती है।

उपरोक्त फायदों के अतिरिक्त प्राणायाम करने से शरीर स्वस्थ्य रहता है। उच्च रक्चाप, ह्रदय रोग जैसी बीमारियां इससे नियंत्रित रहती है। यह मस्तिष्क के विकास के लिए भी बहुत उपयोगी होता है। ऊपर आपने जाना कि प्राणायाम का अर्थ (pranayama meaning in hindi) और प्राणायाम के फायदे। चाहिए अब “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” को के विषय में जानकारी प्राप्त करते है।

 

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प्राणायाम के प्रकार: (Pranayam Ke Prakar)

जानते है “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” को विस्तार से जो की निम्न है।

1) नाड़ी शोधन प्राणायाम (Nadi Sodhana)

pranayam ke prakar - Nadi Sodhana

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” में पहला प्रकार है नाड़ी शोधन प्राणायाम। जिसमे नाड़ी से अभिप्राय रास्ता या फिर शक्ति की धारा से है जबकि शोधन यानी शुद्धिकरण करना। नाड़ी शोधन में नाड़ियों की शुद्धिकरण की प्रक्रिया होती है। इस प्राणायाम को करना बहुत सरल है और इसके फायदे बहुत होते है।

कैसे करें –

  • सबसे पहले आसन को जमीन पर बिछा ले और उस पर पद्मासन की मुद्रा में बैठ जाए।
  • आपको इस मुद्रा में रिलेक्स होकर बैठना है। फिर अपनी दाहिने हाँथ की अंगुलियों को मुंह के समक्ष लाये।
  • अब मध्य अँगुली और तर्जनी अँगुली को धीरे से मस्तिष्क के मध्य में रखे। याद रहे माथे को जोर से प्रेस नहीं करना है
  • इसके बाद दाहिने नासिकाछिद्र के ऊपर दाया अंगूठा और बाए नासिकाछिद्र के ऊपर अनामिका अँगुली को हलके से रखें।
  • अब पहले दाए अंगूठे से एक नासिका छिद्र को बंद करे और दूसरे नासिकाछिद्र से साँस ले।
  • फिर दूसरे नासिका छिद्र से को बंद करे और पहले वाले से सांस को छोड़े। इस तरह एक प्रक्रिया पूर्ण हो जाएगी।
  • 20 से 25 बार प्रक्रिया को दोहराये। आसन को पूर्ण करने के बाद थोड़ी देर बिलकुल शांत मन से बैठ जाए। आपको अच्छा फील होगा।

नाड़ी शोधन प्राणायाम के फायदे – इस प्राणायाम को करने से मन शांत होता है साथ ही एकाग्रता में वृद्धि होती है। इसे करने से तनाव, चिंता, नींद ना आने की समस्या, सर दर्द आदि दूर हो जाता है। ह्रदय और फेफड़ो को यह प्राणायाम शक्ति प्रदान करता है जिससे शरीर स्वस्थ्य रहता है।
ध्यान रखने योग्य सावधानी – जब भी इस प्राणायाम को करे तो इस बात का ध्यान रखे की आपकी पीठ बिलकुल सीधी होनी चाहिए। इस प्राणायाम को सूर्योदय के समय करना अच्छा होता है। जब भी इस प्राणायाम को करे तो खाली पेट करे। यदि आपको कोई बीमारी है तो आपको इसका अभ्यास किसी प्रशिक्षित ट्रेनर की देखरेख में करना चाहिए।

यह था “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का पहला प्राणायाम।

2) शीतली प्राणायाम (Shitali Pranayama)

pranayam ke prakar - Shitali Pranayama

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” में दूसरा प्रकार है शीतली प्राणायाम। इसमें शीतली शब्द को पढ़कर पता चल रहा है कि इसका अभिप्राय शीतलता से है और शीतली प्राणायाम का अर्थ है शीतलता प्रदान करने वाला प्राणायाम। इस प्राणायाम को करने से शरीर में शीतलता आती है। यह प्राणायाम शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। इस प्राणायाम को गर्मी के दिनों में करने से अत्यधिक लाभ मिलता है।

कैसे करें –

  • इस प्राणायाम को करने के लिए पहले आसन को बिछा कर सुखासन या फिर पद्मासन की मुद्रा में बैठ जाए।
  • अपने दोनों हांथों को घुटनों पर रख कर पीठ को सीधा कर ले और रिलेक्स हो जाए।
  • फिर अपनी आंखे बंद कर लें। इसके बाद आरामदायक स्थिति में मुंह से जीभ को बाहर की ओर निकाले।
  • अपनी बाहर की ओर वाली जीभ के दोनों किनारों को रोल कर ले। इसे इस तरह रोल करे जिससे वह ओ के आकार का हो जाए।
  • अब इस जीभ की सहायता से साँस को भीतर ले। जब साँस पूरी अंदर आ जाए तो जीभ को अंदर करते हुए मुंह बंद कर दे।
  • फिर नाक के द्वारा साँस को छोड़े। इस प्रक्रिया में हवा की भांति आवाज आनी चाहिए। इस तरह एक प्रक्रिया पूर्व। इस प्रक्रिया को दोहराये ।

शीतली प्राणायाम के फायदे – यह प्राणायाम शरीर को शीतलता प्रदान करता है। साथ ही इससे दिमाग व् शरीर दोनों शांत रहते है। यह भूख को भी नियंत्रित करता है। इससे भूख का अनुभव कम होने लगता है। इस प्राणायाम के करने से मांसपेशियाँ शिथिल होती है।

ध्यान रखने योग्य सावधानी – इस प्राणायाम को ठण्ड के मौसम में बहुत कम या फिर ना करे। जिन्हे दिल से सम्बंधित बीमारी हो उन्हें भी इस प्राणायाम को नहीं करना चाहिए।

यह था “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का दूसरा प्राणायाम।

3) उज्जायी प्राणायाम (Ujjayi Pranayama)

pranayam ke prakar - Ujjayi Pranayama

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” के प्रकार में तीसरा प्राणायाम है उज्जायी प्राणायाम। उज्जायी प्राणायाम में उज्जायी का अर्थ विजय प्राप्त करने से है और उज्जायी प्राणायाम का अर्थ होता है बंधन से स्वतन्त्रा दिलाना।

कैसे करें –

  • प्राणायाम को करने के लिए आसन बिछाकर पद्मासन मुद्रा में बैठ जाए। आराम की स्थिति में समान साँस ले।
  • इसके बाद अपना ध्यान अपने गले पर केंद्रित करे। ऐसा सोचें कि आपकी साँस का आवागमन आपके गले से हो रहा है।
  • जब साँस लेने की गति धीमी हो जाए तो उस समय अपने गले को संकुचित कर ले। इस प्रक्रिया में गले से हवा की भांति आवाज भी उत्पन्न होगी।
  • इसके बाद लम्बी साँस ले। जब गले द्वारा साँस पर नियंत्रण होने लगे तो गले से साँस लेते हुए साँस को नाक के एक भाग से बाहर निकालें और इसी प्रक्रिया को नाक के दूसरे भाग से भी करे। इस तरह चक्र पूरा होगा।

उज्जायी प्राणायाम के फायदे – यह प्राणायाम शांति प्रदान करता है। इसे करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह माइग्रेन में मददगार होता है। अस्थमा के लिए बहुत ही लाभकारी होता है।

ध्यान रखने योग्य सावधानी – उज्जायी प्राणायाम को खाली पेट सुबह या फिर संध्याकाळ के समय करें। यदि साँस से सम्बंधित कोई समस्या है जो प्रशिक्षक की निगरानी में इसका अभ्यास करना चाहिए।

यह था “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का तीसरा प्राणायाम।

4) कपालभाती प्राणायाम (Kapalabhati Pranayama)

pranayam ke prakar - Kapalabhati Pranayama

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का चौथा  प्रकार है कपालभाती प्राणायाम। कपालभाति को हठयोग भी कहा जाता है। कपालभाति में कपाल का मतलब माथा है और भाती यानि तेज, प्रकाश। इसका अभ्यास करने से मुख पर तेज उत्पन्न होता है। यह बहुत ऊर्जावान प्राणायाम होता है।

कैसे करें –

  • इस प्राणायाम के लिए एक आसन पर आराम की मुद्रा में बैठ जाए। अपने दोनों हांथो को ज्ञान मुद्रा में रखे।
  • फिर आँखों को बंद कर ले। अपनी पीठ और सिर को सीधा रखे।
  • इसके बाद अपनी नासिका छिद्रों द्वारा लम्बी लम्बी सांसे ले। फिर पेट की मांसपेशियों को संकुचित करते हुए साँस को छोड़े।
  • इस बात का ध्यान रखे कि इसे जोर से नहीं करना है। फिर से इस प्रक्रिया को दोहराये। परन्तु जब भी साँस ले तो पेट की मांसपेशियों पर जोर न लगाते हुए साँस ले।

कपालभाती प्राणायाम के फायदे – यह प्राणायाम शरीर की समस्त नाड़ियों की शुद्धिकरण का कार्य करता है। साथ ही मेटाबॉलिज्म को भी सुचारु रूप से संचालित करने में मदद करता है। वजन को कम करता है। रक्त परिसंचार को सही ढंग से कार्य करने में मदद करता है। इसके नियमित अभ्यास से चेहरे पर चमक आती है।

ध्यान रखने योग्य सावधानी – इस आसन को प्रशिक्षक की निगरानी में करना अच्छा रहेगा। तभी आप इसे सही ढंग से कर सकेंगे। इस प्राणायाम को करते समय यदि चक्कर जैसा महसूस होता है तो प्राणायाम को कुछ समय के लिए रोक दे।

यह था “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का चौथा प्राणायाम।

 

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5) दीर्घ प्राणायाम (Dirga Pranayama)

pranayam ke prakar - Dirga Pranayama

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का पाँचवा प्रकार है दीर्घ प्राणायाम। दीर्घ का अर्थ होता है लम्बा। दीर्घ प्राणायाम यानी की लम्बी आयु प्रदान करना। इस प्राणायाम को दीर्घायु बनाने वाला प्राणायाम कहा जाता है।

कैसे करें –

  • दीर्घ प्राणायाम को करने के लिए पहले आसन को बिछाकर उस पर सुखासन की मुद्रा में बैठ जाए।
  • इसके बाद अपनी हथेलियों को धीरे से पेट पर रखे। फिर अपने हांथो की दोनों मध्यमा अंगुली को नाभि पर इस तरह रखे कि वह एक दूसरे को स्पर्श करें।
  • धीरे धीरे साँस को बाहर की तरफ छोड़े साथ ही अपने पेट को भी ढीला रखें।
  • इसके बाद साँस को अंदर लेते हुए पेट को फुलाये। इस प्रक्रिया को दोहराये।

दीर्घ प्राणायाम के फायदे – इस प्राणायाम को करने से अनिद्रा की समस्या दूर होती है। यह हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली में भी सुधार करने में सहायक होता है। यह शरीर में ऑक्सीजन को बढ़ाता है जिस कारण आयु दीर्घ होने लगती है।
ध्यान रखने योग्य सावधानी – यदि आपको साँस से सम्बंधित कोई बीमारी है तो अपने डॉक्टर के परामर्श से इस प्राणायाम को प्रशिक्षक की निगरानी में ही करे। प्राणायाम को करते समय चक्कर या बेचैनी हो तो प्राणायाम को रोक दे।

यह था “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का पाँचवा प्राणायाम।

6) भस्त्रिका प्राणायाम (Bhastrika Pranayama)

pranayam ke prakar - Bhastrika Pranayama

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का छठा प्रकार है भस्त्रिका प्राणायाम। भस्त्रिका यानी धौंकनी। जिस तरह एक लौहार वायु के वेग से गर्मी उत्पन्न कर लोहे का शुद्धिकरण करता है ठीक उसी तरह यह प्राणायाम शरीर के दोषों को दूर कर उसका शुद्धिकरण करता है। प्राणायाम में भस्त्रिका प्राणायाम का अपना महत्त्व होता है।

कैसे करें –

  • इस प्राणायाम को करने हेतु एक आसन पर पद्मासन की मुद्रा में बैठ जाएँ।
  • फिर अपनी आँखों को बंद कर ले और शरीर को फ्री छोड़ दे।
  • अपने दोनों हांथो को ज्ञान मुद्रा में रखें। इसके बाद धीरे धीरे साँस को भीतर की तरफ लें।
  • फिर बल के साथ साँस को छोड़ दें। अब फिर से साँस को बल के साथ खीचें और फिर छोड़ दे।
  • ऐसा करने से आपकी छाती बार बार धौंकनी की भांति फूलेगी और पिचक जाएगी।
  • इस प्राणायाम को तीन प्रकार की साँस प्रक्रिया द्वारा भी किया जा सकता है जैसे – पहली प्रक्रिया में धीमी साँस लेंगे यानी की दो सेकंड में एक साँस लेना है। दूसरी प्रक्रिया में एक सेकंड में एक साँस लेनी होगी। तीसरी प्रक्रिया तेज होगी जिसमें आप एक सेकंड में दो साँस लेंगे।

भस्त्रिका प्राणायाम के फायदे – यह प्राणायाम रक्त संचार को सुधारता है। साथ ही शरीर में उपस्थित विषाक्त पदार्थों को दूर करता है। इस प्राणायाम को करने से दमा, मोटापा जैसी बीमारियां हो जाती है।

ध्यान रखने योग्य सावधानी – इस प्राणायाम को हाई ब्लड प्रेशर वाले लोगों को नहीं करना चाहिए। इस प्राणायाम को यदि गर्मियों के दिनों में कर रहे है तो प्राणायाम के उपरांत शीतली प्राणायाम को जरूर करे। क्यूंकि भस्त्रिका प्राणायाम को करने से शरीर में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न होती है। इस कारण शीतली प्राणायाम करने से शरीर का तापमान नियंत्रित हो जायेगा।

यह था “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का छठा प्राणायाम।

7) बाह्य प्राणायाम (Bahya Pranayama)

pranayam ke prakar - Bahya Pranayama

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” के प्रकार में सातवां प्राणायाम है बाह्य प्राणायाम। बाह्य प्राणायाम में बाह्य से तात्पर्य बाहर से होता है और जिस प्राणायाम में साँस को बाहर की तरफ छोड़ते है उसे बाह्य प्राणायाम कहा जाता है। इस प्राणायाम को भी आसानी से किया जा सकता है।

कैसे करें –

  • इस प्राणायाम को करने के लिए सबसे पहले आसन पर पद्मासन की मुद्रा में बैठ जाए।
  • फिर शांत मन से लम्बी लम्बी सांसे ले। इसके बाद जब आप साँस छोड़ रहे हो तो अपने पेट पर अधिक दबाब डालें साथ ही पेट को अंदर की ओर खींचे।
  • ऐसा करते हुए अपने चिन यानी ठोड़ी को अपनी छाती पर स्पर्श कराने का प्रयास करे।
  • कुछ समय के लिए इसी मुद्रा में रहे। इस तरह एक प्रक्रिया पूर्ण हो जाएगी। फिर इसे दोहराये।

बाह्य प्राणायाम के फायदे – यह प्राणायाम मधुमेह रोगियों के लिए बहुत ही लाभकारी होता है। यह एकाग्रता को बढ़ाने में मदद करता है। साथ ही रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।

ध्यान रखने योग्य सावधानी – हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों को इस प्राणायाम को नहीं करना चाहिए। जो महिलाये गर्भवती है उन्हें भी अपने चिकित्सक की सलाह पर यह प्राणायाम करना चाहिए। प्राणायाम को करते समय पेट में दर्द हो तो इसे ना करे।

यह था “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का सातवां प्राणायाम।

8) भ्रामरी प्राणायाम (Bhramari Pranayama)

pranayam ke prakar - Bhramari Pranayama

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का आठवां प्राणायाम है भ्रामरी प्राणायाम। भ्रामरी प्राणायाम में भ्रामरी का अर्थ भौंरा या फिर मधुमक्खी है। भ्रामरी प्राणायाम को करते समय मधुमक्खी की भाँति ध्वनि उत्पन्न होती है। यह प्राणायाम भी बहुत लाभकारी होता है।

कैसे करें –

  • इस आसान को करने के लिए एक स्वच्छ आसन पर पद्मासन की मुद्रा में बैठ जाएँ।
  • अपनी आँखों को बंद कर ले और शरीर को रिलेक्स करने दे।
  • अब मुंह के दोनों तरफ कनिष्का अंगुली, नाक के दोनों तरफ अनामिका अंगुली, आँखों के ऊपर मध्यमा, कपाल के दोनों तरफ पर तर्जनी अंगुली रखे। अब अंगूठे से अपने दोनों कानों को बंद करे।
  • अँगुलियों को सही स्थान पर रखने के बाद नासिका के द्वारा साँस ले फिर थोड़ा रुके और साँस को छोड़ते हुए मधुमक्खी की भांति ध्वनि उत्पन्न करें।
  • इस बात का ध्यान रखे कि आपका मुँह बंद रहे और नासिका के द्वारा ही साँस का आवागमन हो।
  • अब लम्बी सांसे ले फिर थोड़ा रुके और साँस को छोड़े। इस प्रक्रिया को दोहराये।
  • यदि अंगुलियों को सही से रखने में परेशानी आ रही हो तो आप तर्जनी अंगुली द्वारा दोनों कानों को बंद करके भी प्राणायाम को कर सकते है।

भ्रामरी प्राणायाम के फायदे – इस प्राणायाम को करने से तनाव से मुक्ति मिलती है। मन को हल्का महसूस होता है। इससे आत्मविश्वास की वृद्धि होती है।

ध्यान रखने योग्य सावधानी – इस प्राणायाम को खाली पेट करना चाहिए साथ ही इसे सभी प्राणायाम को करने के बाद ही करना चाहिए। इससे अच्छे लाभ प्राप्त होते है।

यह था “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” का आठवां प्राणायाम।

उपरोक्त लेख में आपने जाना प्राणायाम क्या होता है और “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” के बारे में विस्तृत जानकारी। आशा है आपके लिए यह लेख ज्ञानवर्धक होगा।

Frequently Asked Questions

Question 1: प्राणायाम करने से क्या लाभ है ?

प्राणायाम आपके शरीर को स्वथ्य रखता है साथ ही यह आपकी बीमारियों से रक्षा करता है। इसलिए इसे अपने जीवन का हिस्सा बना ले।

Question 2: “प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” क्या है ?

“प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)” निम्न है जैसे – नाड़ी शोधन प्राणायाम, शीतली प्राणायाम, उज्जायी प्राणायाम, कपालभाती प्राणायाम, दीर्घ प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम, बाह्य प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम है।

 

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