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सप्त ऋषियों के नाम - names of Sapt Rishi
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सप्त ऋषियों के नाम, उनकी कहानी और उनका योगदान

प्राचीन काल से ही भारत में ऋषि मुनियों का महत्व रहा है। ऋषि मुनि ज्ञान का आधार होते थे। अपने आश्रमों के द्वारा लोगों को शिक्षित करना, समाज का मार्गदर्शन करने के लिए शास्त्रों और स्मृतियों का निर्माण करना आदि कई कार्य ऋषि मुनियों के द्वारा किये जाते थे। इन सभी ऋषि मुनियों में से सबसे ज्यादा महत्व सप्तऋषि का है और इस पोस्ट में हम सप्तऋषियों के बारे में विस्तार में जानेंगे। सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi), उनकी कहानी और योगदान सभी कुछ इस पोस्ट में हम समझेंगे।

 

कौन है सप्तऋषि? What is Saptarishi?

सप्तऋषि की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के मानसिक संकल्प से हुई थी। ये सप्तऋषि (seven sages) एक रूप में तो नक्षत्रलोक में सप्तर्षि मंडल में स्थित रहते हैं, वहीं दूसरे रूप में तीनों लोकों में विशेष रूप से भूलोक में रहकर लोगों को धर्माचरण और सदाचार की शिक्षा देते हैं। जब चार युग (सत, त्रेता, द्वापर और कलि) बीतते हैं, तब वेदों का अनादर होता है, उस समय सप्तर्षिगण पृथ्वी पर अवतरित होकर वेदों का उद्धार करते हैं। परन्तु क्या आपको पता है की कौन है ये 7 सप्तऋषि (names of Sapt Rishi)?

भिन्न भिन्न मन्वन्तरों में भिन्न भिन्न सप्तर्षि अवतरित हुए हैं। वर्तमान में सातवां मनवन्तर वैवस्वत मनवन्तर चल रहा है। वर्तमान वैवस्वत मनवन्तर के सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) इस प्रकार हैं :- कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज।

आइये अब जानते हैं सभी सप्तऋषि की कहानी (Saptarishi story) के बारे में विस्तार से :-

 

सप्त ऋषियों के नाम (Names of Sapt Rishi)

जैसा की हमने बताया, इन सप्तऋषि का बहुत महत्व है हमारी संस्कृति और जन कल्याण के लिए। आइये जानते है इन 7 सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi), उनकी कहानी और योगदान के बारे में एक एक करके।

1) कश्यप ऋषि (Kashyapa Rishi)

सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) में सबसे पहला नाम महर्षि कश्यप (Kashyapa rishi) का आता है जिनका विशेष उल्लेखनीय योगदान रहा है। उन्हें ही सृष्टि के सृजन करने का श्रेय प्राप्त है। महर्षि कश्यप (Kashyapa Rishi) अपने श्रेष्ठ गुणों, प्रताप एवं तप के बल पर श्रेष्ठतम महाविभूतियों में गिने जाते हैं। महर्षि कश्यप के पिता का नाम मरीचि था, जो भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। इनका आश्रम मेरु पर्वत के शिखर पर माना जाता है।

श्रीनरसिंह पुराण और विष्णु पुराण में महर्षि कश्यप (Kashyapa rishi) की वंशावली का उल्लेख मिलता है। महर्षि कश्यप ने दक्ष प्रजापति की 13 कन्याओं से विवाह किया था। उनकी 13 पत्नियों के नाम है अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, खसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि।

अदिति के गर्भ से 12 आदित्य हुए। अदिति के गर्भ से 49 अन्य पुत्रों का जन्म हुआ, देवराज इंद्र ने इन्हें अपने ही समान देवता बना लिया। वहीं महर्षि कश्यप (Kashyapa rishi) के एक पुत्र विवस्वान हुए तथा विवस्वान से मनु का जन्म हुआ, इन्हें ही वैवस्वत मनु कहा जाता है। महर्षि कश्यप की पत्नी दिति के गर्भ से हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु नामक पुत्र और सिंहिका नाम की पुत्री का जन्म हुआ।

दनु के गर्भ से अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, धुम्रकेश आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई। पत्नी अरिष्टा से गन्धर्व पैदा हुए। सुरसा नामक पत्नी से अनेक विद्याधरपण उत्पन्न हुए। पत्नी खसा से यक्ष एवं राक्षस, सुरभि से गौ, भैंस व दो खुरों वाले पशुओं का जन्म हुआ। विनता से भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ और भगवान सूर्य के सारथि अरुण देव हुए।

ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को, क्रोधवशा ने बाघ आदि हिंसक पशुओं को, इरा ने वनस्पतियों को जन्म दिया। कद्रू की कोख से शेषनाग आदि नागों की उत्पत्ति हुई तथा मुनि नामक पत्नी से अप्सराओं का जन्म हुआ। इस प्रकार देखा जाए तो सभी मनुष्य, पशु पक्षी, वनस्पतियां एवं देवी देवता आदि महर्षि कश्यप की ही संतानें हैं।

महर्षि कश्यप (Kashyapa rishi) ने समाज को एक नयी दिशा देने के लिए स्मृति ग्रन्थ जैसे महान ग्रन्थ की रचना की। इसके अलावा कश्यपजी ने कश्यप संहिता की रचना करके तीनों लोकों में अमरता हासिल की। वहीं ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार कैस्पियन सागर एवं भारत के शीर्ष प्रदेश कश्मीर का नामकरण भी महर्षि कश्यप जी के नाम पर ही हुआ है।

 

2) ऋषि अत्रि (Atri Rishi)

महर्षि अत्रि (Atri rishi) का नाम भी सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) में से एक प्रसिद्ध नाम है। महर्षि अत्रि ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे तथा इनका जन्म ब्रह्माजी के नेत्रों से हुआ था। महर्षि अत्रि का विवाह ऋषि कर्दम और देवहुति की पुत्री देवी अनुसुइया से हुआ था। द्वापरयुग में जन्में भगवान श्रीकृष्ण महर्षि अत्रि (Atri rishi) के ही वंशज थे।

मार्कण्डेय पुराण, श्रीमद्भागवत व महाभारत के सभापर्व के अनुसार त्रिदेवों के वरदान स्वरुप ही महर्षि अत्रि व देवी अनुसईया को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। त्रिदेवों के वरदान स्वरुप ब्रह्माजी के अंश से सोम अर्थात चंद्रदेव, भगवान विष्णु के अंश से दत्तात्रेय एवं भगवान शिव के अंश से ऋषि दुर्वासा का जन्म हुआ।

महर्षि अत्रि का सबसे अधिक उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है। ऋग्वेद के पांचवें मंडल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ही है, इसीलिए इस मंडल को आत्रेय मंडल भी कहा जाता है। इस मंडल में कुल 87 सूक्त हैं। रामायण काल में अत्रि ऋषि चित्रकूट में निवास कर रहे थे। तब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ अत्रि के आश्रम पधारे थे। उस समय महर्षि अत्रि ने श्रीराम को दिव्यास्त्र और कभी न समाप्त होने वाले बाण दिए थे।

महर्षि अत्रि ने आयुर्वेद में भी कई योगों का निर्माण किया था। इनके ऊपर देवताओं के चिकित्सक अश्विनी कुमारों की विशेष कृपा थी। महर्षि अत्रि ज्योतिष से जुड़े 18 ऋषियों में से एक थे।

महर्षि अत्रि की पत्नी अनुसुइया की गिनती 16 सतियों में की जाती है। अनुसुइया के तपोबल से ही गंगा (ganga) की एक धारा चित्रकूट में मन्दाकिनी के नाम से प्रकट हुई थी।

 

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3) वशिष्ठ (Vashistha)

ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि वशिष्ठ भी सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) में सम्मिलित है। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मदेव की प्राण वायु से हुई थी। यही आगे चलकर इक्ष्वाकु वंश के कुलगुरु और भगवान राम और उनके भाइयों के गुरु हुए। महर्षि वशिष्ठ को ऋग्वेद के सातवें मंडल का लेखक व अधिपति माना जाता है। ऋग्वेद के सातवें अध्याय के अनुसार महर्षि वशिष्ठ (Vashistha) ने सबसे पहले अपना आश्रम सिंधु नदी के तट पर बसाया था, उसके बाद में गंगा और फिर सरयू नदी के किनारे आश्रम की स्थापना की थी।

महर्षि वशिष्ठ के पास कामधेनु गाय की पुत्री नंदिनी गाय थी। ये दोनों गायें समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली थी। महर्षि वशिष्ठ योगवशिष्ठ, वशिष्ठ धर्मसूत्र, वशिष्ठ संहिता और वशिष्ठ पुराण आदि के जनक हैं। स्वयं आदि शंकराचार्य जी ने वशिष्ठ जी को वेदांत के आदि ऋषियों में प्रथम बताया था।

प्राचीन काल में गाधि नामक महान राजा के पुत्र हुए कौशिक, यही आगे चलकर विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। एक बार राजा कौशिक अपनी सेना के साथ महर्षि वशिष्ठ (Vashistha) के आश्रम में उनका आशीर्वाद लेने पधारे, तब महर्षि वशिष्ठ ने उनसे कुछ दिनों के लिए रुकने का आग्रह किया। राजा कौशिक ने उनका आतिथ्य स्वीकार कर लिया।

तब राजा कौशिक को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि नंदिनी किसी भी प्रकार की सामग्री क्षणभर में उपस्थित कर देती। तब उन्हें नंदिनी को प्राप्त करने का लालच जाग गया। उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से नंदिनी गाय को देने का आग्रह किया। जब महर्षि वशिष्ठ ने मना कर दिया, तब राजा कौशिक बलपूर्वक नंदिनी को ले जाने लगे।

महर्षि वशिष्ठ ने राजा कौशिक की पूरी सेना को समाप्त कर दिया। राजा कौशिक एक ब्राह्मण से हार चुके थे। अतः प्रतिशोध लेने के लिए अपना राजपाठ त्याग कर तपस्या करने चले गए। उन्होंने घोर तप करके ब्रह्मास्त्र समेत अन्य दिव्यास्त्र प्राप्त किये। उसके बाद वे वशिष्ठ के आश्रम पहुंचे और उनसे युद्ध करने लगे। उन्होंने एक एक कर सभी दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया, फिर भी महर्षि वशिष्ठ को परास्त नहीं कर सके।

कौशिक को बार बार पराजित करने के बाद भी महर्षि वशिष्ठ ने उनका वध नहीं किया। तब कौशिक के मन में छुपकर वार करने का विचार आया। जब वे छुपकर महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुंचे, तब महर्षि वशिष्ठ अपनी पत्नी से उन्हीं के बारे में बात कर रहे थे। महर्षि वशिष्ठ ने उनके लिए राजर्षि विश्वामित्र का सम्बोधन किया। इस प्रकार महर्षि वशिष्ठ के मुख से अपने लिए ऐसे सम्मान सूचक शब्द सुनकर विश्वामित्र पुनः तपस्या में लीन हो गए।

 

4) विश्वामित्र (Vishvamitra Rishi)

महर्षि विश्वामित्र का वर्णन मुख्य रूप से रामायण में आता है। एक बार महर्षि विश्वामित्र (Vishvamitra rishi) राजा दशरथ के दरबार में आते हैं तथा कहते हैं कि उनके आश्रम पर असुर आक्रमण करते हैं और उन्हें यज्ञादि कार्य नहीं करने देते। अतः आप उनसे हमारी रक्षा करें, तब भगवान श्रीराम और लक्ष्मण उनके साथ जाते हैं तथा उनके आश्रम की रक्षा करते हुए कई राक्षसों का वध कर देते हैं।

महर्षि विश्वामित्र का जन्म महाराज गाधि के पुत्र कौशिक के रूप में हुआ था। राजा कौशिक जब महर्षि वशिष्ठ से पराजित हो जाते हैं, तब उन्हें यह अहसास होता है कि क्षत्रिय बल से ज्यादा शक्तिशाली है ब्रह्मतेज। अतः वे ब्राह्मणत्व की प्राप्ति करने के लिए घोर तपस्या करने चले जाते हैं।

उसके बाद उन्होंने हजारों वर्षों की कठिन तपस्या करके ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया। जब ब्रह्माजी ने सभी देवताओं सहित विश्वामित्र के पास आकर उनसे कहा कि तुमने ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त कर लिया है। तब विश्वामित्र (Vishvamitra rishi) जी ने कहा कि स्वयं महर्षि वशिष्ठ मेरे पास आकर यह बात कहें। तब महर्षि वशिष्ठ ने विश्वामित्र जी के पास आकर कहा कि आप ब्रह्मर्षि हो गए।

इस प्रकार महर्षि विश्वामित्र जन्म से ब्राह्मण नहीं थे, अपितु घोर तपस्या करके उन्होंने ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया था। महर्षि विश्वामित्र पुरुषार्थ और तपस्या के मूर्तिमान प्रतीक थे। जन्म से एक क्षत्रिय होने के बाद भी महर्षि विश्वामित्र ने कठोर तप के द्वारा ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया। इसी कारण इनका सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) में विशिष्ट स्थान है।

 

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5) महर्षि गौतम (Gautama)

सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) में से एक नाम महर्षि गौतम का है जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अंगिरा के वंशज हैं। पुराणों में ऐसी कथा मिलती है कि गौतम (Gautama) जन्मांध थे। उन पर कामधेनु गाय प्रसन्न हुई तथा इस गाय ने उनका तम अर्थात अंधत्व हर लिया। तब से इन्हें गौतम कहा जाने लगा। गौतम ऋषि का विवाह देवी अहिल्या से हुआ था तथा इनके पुत्र का नाम महर्षि शतानन्द था, जो राजा जनक के राजपुरोहित हुए। महर्षि शतानन्द ने ही भगवान राम और सीता जी का विवाह संपन्न करवाया था।

इंद्र ने जब अहिल्या जी के साथ अनुचित बर्ताव किया। तब ऋषि गौतम (Gautama) ने इंद्र को श्राप दिया तथा अपनी पत्नी को भी पत्थर का हो जाने का श्राप दिया। परन्तु जब महर्षि गौतम का क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने अहिल्या को वरदान दिया कि वह भगवान श्रीराम के चरणों को छूकर ही इस श्राप से मुक्त हो पाएंगी। उसके बाद ऋषि गौतम हिमवान पर्वत पर तपस्या करने चले गए। जब भगवान राम की चरणधूलि से अहिल्या पुनः पवित्र हो गयी, तब ऋषि गौतम ने उन्हें पुनः स्वीकार कर लिया।

महर्षि गौतम ने न्यायशास्त्र की रचना की थी। महर्षि गौतम ने ही अपने तप से भगवान शंकर को प्रसन्न करके उनसे त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग और गोदावरी की उत्पत्ति का वरदान माँगा था।

 

6) महर्षि जमदग्नि (Jamadagni Rishi)

भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि का नाम भी सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) में से एक है। महर्षि जमदग्नि (Jamadagni rishi) ब्रह्मा जी के मानस पुत्र भृगु के वंशज थे। ऋषि जमदग्नि ने अपनी तपस्या एवं साधना से उच्च स्थान प्राप्त किया। उनका विवाह राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से हुआ था। रेणुका से इन्हें पांच पुत्रों की प्राप्ति हुई। इनके नाम थे रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस और परशुराम। ऋषि जमदग्नि की पत्नी रेणुका पतिव्रता एवं आज्ञाकारी स्त्री थी।

एक बार रेणुका जल लेने के लिए नदी पर जाती है। वहां पर गन्धर्व चित्ररथ और अप्सराओं को देखकर आसक्त हो जाती है और जल लाने में विलम्ब हो जाता है, जिससे यज्ञ का समय समाप्त हो जाता है। ऋषि जमदग्नि अपनी योग शक्ति से इस घटना को देख लेते हैं तथा क्रोध में आकर अपने पुत्रों को माता का वध करने को कहते हैं। बाकि चारों पुत्र मना कर देते हैं, परन्तु परशुराम जी पितृ आज्ञा मानकर माँ का वध कर देते हैं। उनकी पितृभक्ति को देखकर पिता जमदग्नि उनसे वरदान मांगने को कहते हैं, तब वे माता को पुनः जीवित करने की विनती करते हैं।

 

7) महर्षि भारद्वाज (Bharadvaja)

सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) में महर्षि भारद्वाज (Bharadvaja) का अति उच्च स्थान है। महर्षि भारद्वाज देवगुरु बृहस्पति और ममता के पुत्र थे। महर्षि भारद्वाज मंत्र, अर्थशास्त्र, शस्त्रविद्या, आयुर्वेद आदि विषयों के विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक थे। ऋग्वेद के छठें मंडल के द्रष्टा महर्षि भारद्वाज ही कहे गए हैं, इस मंडल में भारद्वाज के 765 मंत्र है। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मंत्र हैं।

महर्षि भारद्वाज को व्याकरण का ज्ञान इंद्र से प्राप्त हुआ था। वहीं महर्षि भृगु ने उन्हें धर्मशास्त्र का उपदेश दिया था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार भारद्वाज महर्षि (Bharadvaja) वाल्मीकि के शिष्य थे। चरक संहिता के अनुसार भारद्वाज ने इंद्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। महर्षि भारद्वाज ने आयुर्वेद संहिता, भारद्वाज स्मृति, भारद्वाज संहिता, राजशास्त्र, विमानशास्त्र आदि ग्रंथों की रचना की थी। इनके इसी योगदान को देखते हुए ही इन्हें सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) में अति उच्च स्थान प्राप्त है।

वैसे तो वायुयान बनाने के सिद्धांत पहले से ही मौजूद थे, परन्तु पहली बार महर्षि भारद्वाज ने ही विमान शास्त्र पर एक विस्तृत शास्त्र लिखा था। विमान शास्त्र में 8 अध्याय और 3000 श्लोक हैं। इस शास्त्र में यात्री विमान के अलावा लड़ाकू विमान, अंतरिक्ष यान आदि के बारे में भी विस्तृत उल्लेख मिलता है।

 

वर्तमान में उपरोक्त सभी सप्तऋषि (saptarishis) तारामंडल के रूप में आकाश में स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु के 10वें अवतार भगवान कल्कि धरती पर अवतरित होंगे, तब जो भी सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) जो भी हमने ऊपर वर्णित किए है, वे मानव रूप में आकर भगवान कल्कि को वेदों और धर्म शास्त्रों का ज्ञान प्रदान करेंगे। साथ ही सप्तऋषि (seven sages) पुरे विश्व में पुनः ज्ञान की स्थापना करेंगे।

आशा है कि आपको सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi), उनकी कहानी और योगदान के बारे में पता चला होगा। हमारी संस्कृति और प्राचीन ग्रंथों में ऐसे कई जानकारियां उपलब्ध है और यह हमारा कर्त्तव्य है कि इसे आगे लोगों तक पहुंचाया जाए। भारतीय संस्कृति, वेद और धर्म-शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करने के लिए पावन ऐप डाउनलोड करें।

 

Frequently Asked Questions

Question 1: सप्तऋषि की उत्पत्ति कैसे हुई?

सप्तर्षियों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के मानसिक संकल्प से हुई थी। उनके विभिन्न अंगों से 10 पुत्रों का जन्म हुआ, जो अलग अलग समय पर सप्त ऋषियों के रूप में अवतरित हुए। अत्रि ऋषि का जन्म ब्रह्माजी के नेत्रों से तथा वशिष्ठ का जन्म ब्रह्माजी की प्राणवायु से हुआ था।

Question 2: सप्त ऋषि कौन कौन थे?

वर्तमान वैवस्वत मनवन्तर के सप्त ऋषियों के नाम (names of Sapt Rishi) इस प्रकार हैं :- कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज।

Question 3: सप्त ऋषि की पत्नियों के नाम क्या थे?

सप्त ऋषियों की पत्नियों के नाम इस प्रकार है:

  • कश्यप ऋषि : उनकी 13 पत्नियों के नाम है अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, खसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि।
  • महर्षि अत्रि : महर्षि अत्रि की पत्नी का नाम देवी अनुसुइया था।
  • वशिष्ठ : वशिष्ठ जी की पत्नी का नाम देवी अरुंधति था।
  • महर्षि गौतम : इनकी पत्नी का नाम देवी अहिल्या था।
  • महर्षि जमदग्नि : महर्षि जमदग्नि की पत्नी का नाम रेणुका था।
  • महर्षि भारद्वाज : महर्षि भारद्वाज की पत्नी का नाम सुशीला था

Question 4: सप्त ऋषियों के नाम in English?

The names of Saptrishis of the present Vaivasvata Manvantara are as follows:- Kashyapa Rishi, Atri Rishi, Vashistha Rishi, Vishvamitra, Gautama, Jamadagni and Bharadvaja.

 

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